10वीं इतिहास VVI प्रश्न 2026 | 100% बोर्ड में आएंगे | Bihar Board 2026

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नमस्कार दोस्तों! आज के इस आर्टिकल में हम बिहार बोर्ड 2026 मैट्रिक एग्जाम के लिए इतिहास (हिस्ट्री) के 100% गारंटीड महत्वपूर्ण प्रश्न बता रहे हैं। ये VVI subjective प्रश्न पिछले पेपर्स और एक्सपर्ट एनालिसिस से चुने गए हैं, जो परीक्षा में बार-बार आते हैं। अच्छे से पढ़ें, याद करें और फुल मार्क्स लाएं!

दीर्घ उत्तरीय VVI प्रश्न

1. प्रथम विश्व युद्ध का भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन के साथ अंतर्संबंधों की विवेचना करें

प्रथम विश्व युद्ध (1914-1918) ने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को गहराई से प्रभावित किया, जिससे स्वतंत्रता संग्राम को नई गति और दिशा मिली। इस युद्ध ने ब्रिटिश शासन की कमजोरियों को उजागर किया और भारतीयों में राष्ट्रवादी चेतना को जागृत किया
आर्थिक प्रभाव

युद्ध के दौरान भारत से ब्रिटेन को भारी मात्रा में सैनिक, अनाज और संसाधन भेजे गए, जिससे देश में महंगाई, बेरोजगारी और करों में वृद्धि हुई। आयात रुकने से भारतीय उद्योगों को अस्थायी लाभ मिला, लेकिन युद्धोत्तर काल में ब्रिटिश नीतियों ने इन्हें नुकसान पहुंचाया, जिससे उद्योगपति राष्ट्रीय आंदोलन के प्रति झुकाव रखने लगे। जबरन भर्ती और खाद्य संकट ने ग्रामीणों में असंतोष पैदा किया, जो स्वदेशी और स्वराज की मांग को बल देता गया।

राजनीतिक प्रभाव

ब्रिटिश सरकार ने युद्ध में भारत की सहायता के बदले स्वशासन के वादे किए, लेकिन युद्ध समाप्ति पर रौलट एक्ट (1919) जैसे दमनकारी कानून लाकर इन्हें तोड़ दिया। इससे जलियांवाला बाग हत्याकांड हुआ, जिसने अहिंसक असहयोग आंदोलन को जन्म दिया। इसके अलावा, युद्ध ने घर वापसी आंदोलन और खिलाफत आंदोलन को प्रेरित किया, जहां हिंदू-मुस्लिम एकता मजबूत हुई।

सामाजिक-मानसिक प्रभाव

युद्ध में 13 लाख भारतीय सैनिकों की भागीदारी ने गोरे श्रेष्ठता के मिथक को भंग किया, क्योंकि उपनिवेशों में ब्रिटिश बर्बरता का पर्दाफाश हुआ। राष्ट्रवादी नेता जैसे गांधीजी ने इन परिस्थितियों का उपयोग सत्याग्रह और स्वराज के प्रसार के लिए किया। मजदूर वर्ग भी महंगाई से पीड़ित होकर आंदोलन में शामिल हुआ

प्रमुख आंदोलनों पर प्रभाव
  • असहयोग आंदोलन (1920-22): खिलाफत मुद्दे और युद्धोत्तर धोखे से प्रेरित, गांधीजी के नेतृत्व में चला।

  • गैर-सहयोग और सविनय अवज्ञा: युद्धजनित आर्थिक संकट ने जनसमर्थन बढ़ाया।

  • क्रांतिकारी गतिविधियां: डिफेंस ऑफ इंडिया एक्ट ने इन्हें उग्र बनाया

दीर्घकालिक परिणाम

प्रथम विश्व युद्ध ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को उग्रपंथी और असहयोगी धारा प्रदान की, जिससे 1930-40 के दशक के आंदोलनों का आधार बना। कुल मिलाकर, युद्ध ने ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध एकजुटता को मजबूत किया।

2. असहयोग आंदोलन के कारण एवं परिणाम का वर्णन करें

असहयोग आंदोलन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का एक महत्वपूर्ण चरण था, जिसकी शुरुआत महात्मा गांधी के नेतृत्व में 1920 में हुई। यह आंदोलन ब्रिटिश शासन के खिलाफ अहिंसक प्रतिरोध का प्रतीक बना, जिसमें सरकारी संस्थाओं, विदेशी वस्तुओं और सेवाओं का बहिष्कार किया गया। इसके कारणों में राष्ट्रीय असंतोष और परिणामों में जनजागरण प्रमुख रहे।

प्रमुख कारण

आंदोलन का प्रारंभिक कारण खिलाफत आंदोलन था, जिसमें भारतीय मुसलमानों ने तुर्की के खलीफा के अपमान के विरुद्ध ब्रिटिश नीतियों का विरोध किया। जलियांवाला बाग हत्याकांड (1919) और रॉलेट एक्ट ने जनता में व्यापक आक्रोश पैदा किया, क्योंकि इनसे निर्दोष लोगों की हत्या और मनमानी गिरफ्तारियां संभव हो गईं। इसके अलावा, प्रथम विश्व युद्ध के बाद ब्रिटिश सरकार द्वारा दिए वादे पूरे न करने और स्वराज की मांग ने इसे बल दिया।

आंदोलन की मुख्य विशेषताएं

गांधीजी ने 4 सितंबर 1920 को कलकत्ता अधिवेशन में इसे स्वीकृति दिलाई, जो 1922 में चौरी-चौरा कांड के बाद स्थगित हुआ। इसमें स्कूल-कॉलेज, अदालतें, विधानसभाएं, सरकारी नौकरियां और विदेशी कपड़ों का बहिष्कार शामिल था, साथ ही स्वदेशी और खादी को बढ़ावा दिया गया। हिंदू-मुस्लिम एकता इसका विशेष आधार बनी।

मुख पप्ररिणाम

आंदोलन से जनता का अपार सहयोग मिला, लाखों छात्रों ने सरकारी संस्थाएं छोड़ दीं और काशी विद्यापीठ, जामिया मिलिया जैसे राष्ट्रीय संस्थान स्थापित हुए। हजारों लोगों ने नौकरियां त्यागीं, विदेशी वस्तुओं की होली जलाई गई, जिससे स्वदेशी उद्योगों को प्रोत्साहन मिला। इसने राष्ट्रीय चेतना जागृत की, लेकिन हिंसा के कारण समाप्त होने से हिंदू-मुस्लिम एकता प्रभावित हुई।

दीर्घकालिक प्रभाव

इसने कांग्रेस को जनआंदोलन बनाया और ब्रिटिश शासन को झकझोर दिया, जिससे आगे के आंदोलनों का आधार तैयार हुआ। हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में स्वीकृति मिली तथा कुटीर उद्योगों का विकास हुआ। कुल मिलाकर, यह स्वराज्य की नींव मजबूत करने वाला आंदोलन साबित हुआ।

3. सविनय अवज्ञा आन्दोलन के कारणों की विवेचना करें

सविनय अवज्ञा आंदोलन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का एक निर्णायक चरण था, जिसकी शुरुआत महात्मा गांधी ने 1930 में दांडी यात्रा से की। यह आंदोलन ब्रिटिश कानूनों का अहिंसक उल्लंघन पर आधारित था, जिसमें नमक कानून तोड़ना प्रमुख प्रतीक बना। इसके कारणों में राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक असंतोष प्रमुख थे, जो असहयोग आंदोलन के बाद उत्पन्न शून्यता को भरने वाले साबित हुए

राजनीतिक कारण

साइमन कमीशन (1927) का बहिष्कार इसका प्रमुख राजनीतिक कारण बना, क्योंकि इसमें कोई भारतीय सदस्य नहीं था और यह संवैधानिक सुधारों की समीक्षा के लिए आया था। नेहरू रिपोर्ट (1928) में डोमिनियन स्टेटस की मांग को ब्रिटिश सरकार ने अस्वीकार कर दिया, जिससे पूर्ण स्वराज की मांग लाहौर अधिवेशन (1929) में जोर पकड़ ली। गांधीजी की 11 सूत्री मांगें (जैसे नमक कर हटाना) पूरी न होने पर आंदोलन शुरू हुआ।

आर्थिक कारण

विश्वव्यापी आर्थिक मंदी (1929-30) ने भारत को बुरी तरह प्रभावित किया, किसानों पर भारी कर और लगान का बोझ बढ़ा। नमक जैसे आवश्यक वस्तु पर ब्रिटिश एकाधिकार और कर ने जनता को पीड़ित किया, जबकि घरेलू उद्योग नष्ट हो रहे थे। महंगाई, बेरोजगारी और निर्यात में गिरावट ने व्यापक असंतोष पैदा किया।

सामाजिक-सांस्कृतिक कारण

पूर्व आंदोलनों (जैसे असहयोग) की असफलता और ब्रिटिश दमन ने नई रणनीति की आवश्यकता उत्पन्न की। समाजवादी विचारों और क्रांतिकारी उभार का बढ़ना चिंता का विषय था, जिसे गांधीजी अहिंसक मार्ग से संतुलित करना चाहते थे। हिंदू-मुस्लिम एकता कमजोर होने से गांधी ने सभी वर्गों को जोड़ने का प्रयास किया।

गांधीजी का नेतृत्व

गांधी का समझौतावादी रुख अंतिम कारण बना; वायसराय इरविन ने मांगें मानने से इंकार कर दिया। दांडी मार्च (12 मार्च 1930) ने आंदोलन को जन-आंदोलन बना दिया, जिसमें महिलाओं और निचले वर्गों की भागीदारी उल्लेखनीय रही।

4. भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलनों में गाँधी जी के योगदान की विवेचना करें।

महात्मा गांधी ने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को जन-आंदोलन का रूप देकर स्वतंत्रता संग्राम को नई दिशा प्रदान की। उनके सत्याग्रह, अहिंसा और स्वदेशी के सिद्धांतों ने आम जनता को ब्रिटिश शासन के खिलाफ एकजुट किया। गांधीजी का योगदान चंपारण सत्याग्रह से भारत छोड़ो आंदोलन तक फैला, जिसने 1947 की आजादी सुनिश्चित की।

प्रारंभिक सत्याग्रह

1917 के चंपारण सत्याग्रह से गांधीजी ने भारतीय किसानों के नील की खेती के शोषण के विरुद्ध पहला सफल आंदोलन चलाया, जो राष्ट्रीय स्तर पर उनका उदय बना। 1918 के खेड़ा आंदोलन में गुजरात के किसानों को लगान माफी दिलाई, जबकि अहमदाबाद मिल मजदूर आंदोलन ने श्रमिकों को संगठित किया। इनसे सत्याग्रह की अवधारणा लोकप्रिय हुई।

असहयोग आंदोलन (1920-22)

खिलाफत आंदोलन के साथ जोड़कर असहयोग आंदोलन शुरू किया, जिसमें सरकारी संस्थाओं, अदालतों और विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार हुआ। लाखों लोगों ने भाग लिया, स्वदेशी और खादी को बढ़ावा मिला, जिससे राष्ट्रीय चेतना जागृत हुई, हालांकि चौरी-चौरा कांड से स्थगित

सविनय अवज्ञा आंदोलन (1930-34)

दांडी मार्च (1930) से नमक कानून तोड़कर आंदोलन का प्रारंभ किया, जो महिलाओं और सभी वर्गों में फैला। गांधी-इरविन समझौता (1931) इसका परिणाम बना, जिसने ब्रिटिश नीतियों को चुनौती दी और अंतरराष्ट्रीय ध्यान आकर्षित किया।

भारत छोड़ो आंदोलन (1942)

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ‘करो या मरो’ का नारा देकर आंदोलन चलाया, जो सबसे व्यापक जन-आंदोलन बना। इससे ब्रिटिश कमजोर हुए और आजादी की प्रक्रिया तेज हुई

सामाजिक-सांस्कृतिक योगदान

गांधीजी ने हिंदू-मुस्लिम एकता, अस्पृश्यता निवारण, महिला सशक्तिकरण और ग्रामीण विकास पर जोर दिया। स्वदेशी, स्वावलंबन और रामराज्य की अवधारणा से राष्ट्रीय एकता मजबूत की। उनका अहिंसक प्रतिरोध विश्व स्तर पर प्रेरणा बना।

5. भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन में वामपंथियों की भूमिका को रेखांकित करें

भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में वामपंथियों ने समाजवादी और कम्युनिस्ट विचारधाराओं को मजबूत किया, विशेष रूप से मजदूर वर्ग और किसानों को संगठित कर। उनकी भूमिका कांग्रेस के नरम दृष्टिकोण के विरुद्ध उग्रता लाने वाली रही, हालांकि कई बार आंदोलन से अलग-थलग भी पड़ी। वामपंथियों ने राष्ट्रीय आंदोलन को वर्ग-संघर्ष का रूप दिया।

प्रारंभिक विकास

1920 में एम.एन. रॉय ने ताशकंद में कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना की, जो रूसी क्रांति से प्रेरित थी। असहयोग आंदोलन के दौरान पत्र-पत्रिकाओं से विचार प्रचार किया और आतंकवादी गतिविधियों से जुड़े। पेशावर (1922-23), कानपुर (1924) और मेरठ षड्यंत्र केस (1929-33) से वे राष्ट्रवादी शहीद बने।

ट्रेड यूनियन आंदोलन

ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस (AITUC) और फेडरेशन के माध्यम से मजदूर संघों में वामपंथ का प्रसार हुआ। वे कांग्रेस को उद्योगपति-जमींदार समर्थक मानते थे, जो मजदूर शोषण को बढ़ावा दे रही थी। सविनय अवज्ञा के दौरान कांग्रेस का विरोध किया, जिससे संबंध टूटे।

कांग्रेस के अंदर वामपंथ

1920 के दशक के अंत में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी (CSP) का गठन हुआ, जिसमें जयप्रकाश नारायण, आचार्य नरेंद्र देव जैसे नेता थे। 1934 में समाजवादी दल के रूप में मजबूत बने, भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय रहे। सुभाष बोस के फॉरवर्ड ब्लॉक से भी जुड़े।

स्वतंत्रता के निकट भूमिका

भारत छोड़ो आंदोलन (1942) में वामपंथियों ने हड़तालें और भूमि क्रांति को बढ़ावा दिया, लेकिन द्वितीय विश्व युद्ध में ब्रिटिश समर्थन से विवादास्पद बने। कुल मिलाकर, उन्होंने आंदोलन को समाजवादी दिशा दी, पर कांग्रेस से वैचारिक टकराव प्रमुख रहा।

मेरा नाम ANKUSH KUSHWAHA है मैं एक युवा कंटेंट क्रिएटर हूं शिक्षा में गहरी रुचि रखने वाला लेखक हूँ। मैं खासकर Education Updates, स्टार्टअप्स, बिज़नेस जैसे विषयों पर रिसर्च आधारित आर्टिकल लिखता हूँ। मेरी पहचान एक यूट्यूबर के रूप में है। मेरा उद्देश्य है कि जटिल जानकारियों को सरल भाषा में समझाकर ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुँचाया जाए। धन्यवाद!

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